
वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज रिपोर्ट
लखनऊ। सहारा समूह पर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। निवेशकों का पैसा वर्षों से फंसा रहने और अदालतों में मामले लटके होने के बाद अब न्याय की उम्मीदें दोबारा जग उठी हैं।
सहारा इंडिया के डिप्टी मैनेजिंग वर्कर ओ.पी. श्रीवास्तव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है। अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित करते हुए संपत्ति कुर्की का आदेश भी दे दिया है। इसके बावजूद गिरफ्तारी न होने पर निवेशकों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या ताकत और रसूख के दम पर अब भी “सेटिंग-मैनेजमेंट” का खेल जारी है?

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पूर्व अधिकारी दंपति की FIR, कोर्ट का सख्त आदेश
लखनऊ के अलीगंज कोतवाली में सहारा समूह के एक पूर्व अधिकारी दंपति ने ओ.पी. श्रीवास्तव पर वेतन न देने का गंभीर आरोप लगाया था।
एफआईआर दर्ज होने के बाद सिद्धार्थनगर की अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित करते हुए कुर्की की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की औपचारिकताएं भी जारी हैं।
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निवेशकों की मांग – “संपत्तियां नीलाम कर लौटाया जाए पैसा”
निवेशकों का कहना है कि जब तक सहारा समूह की पैतृक और कारोबारी संपत्तियों की नीलामी नहीं होगी, तब तक उन्हें राहत नहीं मिलेगी।
एक निवेशक ने कहा –
> “हमारे पैसों से बने साम्राज्य का ढहना हमें मंजूर नहीं। हर परिवार को उसका हक़ मिलना चाहिए, वरना हमारी लड़ाई जारी रहेगी।”
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धीमी रिफंड प्रक्रिया से नाराज़ निवेशक
सहारा समूह पर यह आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं कि एजेंटों के ज़रिए देशभर से करोड़ों निवेशकों का पैसा जुटाया गया और उसका गलत इस्तेमाल हुआ।
हालांकि सरकार ने ‘सहारा रिफंड पोर्टल’ शुरू किया है, लेकिन निवेशकों को रकम बेहद धीमी गति से ही वापस मिल पा रही है।
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सहारा भवन और सहारा सिटी पर कार्रवाई
लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सहारा सिटी को खाली कराने का आदेश नगर निगम और विकास प्राधिकरण ने जारी कर दिया है।
समय सीमा समाप्त हो चुकी है, और अब सीलिंग व कब्ज़ा प्रक्रिया की तैयारी की जा रही है।
कभी सुब्रत राय सहारा के साम्राज्य का प्रतीक ‘सहारा भवन’ अब गिरती साख और ढहते साम्राज्य का प्रतीक बन गया है।
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बड़े सवाल – जवाबदेही सिर्फ ओ.पी. श्रीवास्तव तक क्यों?
जानकारों का कहना है कि जिम्मेदारी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं हो सकती।
सुब्रत राय की पत्नी स्वप्ना राय और अन्य शीर्ष अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
क्या इनके खिलाफ जांच रोकने के पीछे कोई राजनीतिक या आर्थिक सौदा छिपा है?
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उम्मीदें अब भी ज़िंदा हैं
हालांकि प्रक्रिया धीमी है, लेकिन हालिया कार्रवाइयों ने निवेशकों में उम्मीद जगाई है।
अगर सरकार, अदालत और एजेंसियां मिलकर संपत्तियां नीलाम कर रकम सहारा-सेबी खाते में जमा कराती हैं, तो यह मामला भारत के आर्थिक इतिहास में जवाबदेही और न्याय की मिसाल बन सकता है।
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